Tuesday, 14 May 2019

Magical Melghat Tiger Reserve with ISLPIndore

दोस्तों मेलघाट टाइगर रिज़र्व पिछले १० सालों से मेरे-दिलो दिमाग पर छाया हुआ है,और ना जाने कितनी बार में वहां जा चूका हूँ और हर बार मुझे सबकुछ नया सा लगता है। मेलघाट इंदौर से 275 KM की दुरी पर स्थित है और यहाँ लगभग हर तरह के जंगली जानवर पाए जाते हैं, लेकिन एक बात जो इसे बहोत ज़्यादा ख़ास बनती है वो यह है की यहाँ कुछ दुर्लभ प्रजाति के जानवर भी निवास करते हैं और पहाड़ी इलाका होने के कारन यहाँ की खूबसूरती देखते ही बनती है। पक्षी प्रेमियों के लिए तो यह जगह जन्नत है जन्नत!


मेलघाट में कहा रुके, कैसे जाएँ, बुकिंग कैसे करें, ये सभी जानकारी इस पोस्ट के आखिर में दी गई है। 







बाकी नेशनल पार्क की तरह यहां पर टाइगर आसानी से तो नहीं दीखता परन्तु जब दिखता है तो रोमांच की लहर पुरे दिलो दिमाग में दौड़ जाती है। बाकि जानवरों में यहाँ तेंदुआ और भालू बहुतायत में हैं और शाकाहारी जानवरों की लगभग सम्पूर्ण प्रजाति यहाँ मौजूद है। शर्मीले और चुस्त स्वभाव के जंगली कुत्ते (ढोल) भी यहाँ आसानी से देखे जा सकते हैं। ऐसा बोला जाता है की ढोल का झुण्ड किसी टाइगर को भी मार सकता है और अक्सर टाइगर या ढोल एक दूसरे के बच्चों को अपना निशाना बनाते रहते हैं।



हमारी टीम ने दिनांक 10-मई-2019 को 3 दिवसीय जंगल भ्रमण का कार्यक्रम मेलघाट टाइगर रिज़र्व के शाहनूर रेंज में आयोजित किया जिसमे 10 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। भ्रमण के दौरान प्रतिभागियों को निम्नलिखित विषयों पर जानकारी दी गई :-

- जंगलों का महत्त्व एवं वर्तमान ज्वलंत मुद्दे 
- वन्य प्राणियों के स्वभाव एवं उनके मिजाज के बारे में जानकारी 
- खतरनाक प्राणियों के बारे में जानकारी एवं सावधानियां 
- रात्रिचर वन्यप्राणियों के बर्ताव एवं उनको सुरक्षित रूप से अवलोकन करने का तरीका 
- वन्यप्राणी संरक्षण के विभिन्न उपाय एवं मुद्दे 
- बाघ को उसके प्राकृतवास में खोजने और देखने के तरीके 
- बाघ को खोजने में सहायता करने वाले प्राणियों जैसे चीतल,सांभर,लंगूर,टिटहरी एवं भौंकने वाले मृग की आवाज़ पहचानना 
- भालू एवं तेंदुए के बर्ताव एवं उनके हमले से बचने के लिए सावधानियां

उपरोक्त बातों के अलावा सभी प्रतिभागी इस बात से भी अचंभित थे की मेलघाट के जंगलों में भौकने वाला मृग (barking deer) भी मिलता है जो की किसी कुत्ते की तरह भोंकता है और मज़ा तो तब आया जब सभी ने पहली बार उड़ने वाली गिलहरी (Flying Squirrel) को उड़ते हुए देखा। बच्चों का उत्साह तो तब देखने को मिला जब उन्होंने हरे रंग का कबूतर (हरियल) देखा और चारो तरफ इतने सारे रंग-बिरंगे पक्षियों की चहचहाहट ने उनको मंत्रमुग्ध कर दिया।



सुभह की शुरुवात elephant safari से होना थी। हम सभी हाथियों के आने का इंतज़ार कर रहे थे। मेलघाट में हाथियों को बाँध के नहीं रखा जाता, उन्हें शाम को जंगलों में छोड़ दिया जाता है और सुबह होते ही वापस बुला लिया जाता है। हम इंतज़ार कर ही रहे थे की इसी बिच सबसे बूढी हथनी (लक्ष्मी) जिसे 75 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्त कर दिया गया है और जिसको वन विभाग बड़े ही प्यार से पाल रहा है वो जंगल से हमारी ओर आती दिखी और बाकि सारे हाथी उसके पीछे-पीछे लाइन से आ रहे थे| हाथियों के समाज में बड़ो का स्थान सबसे ऊँचा रहता है इसलिए सभी हाथी उसके पीछे ही चल रहे थे। उनके नज़दीक आने पर लक्ष्मी एक पेड़ के सहारे खड़ी हो गई और बाकि सभी हाथियों को उनके महावतों ने संभाल लिया।


जब सभी महावत दूसरे हाथियों को तैयार कर रहे थे तब हमारे दलनायक अंबुज जैन दल के सबसे छोटे प्रतिभागी शौर्यादित्य को लक्ष्मी से मिलवाने ले गए। छोटे बच्चे को अपने पास देखकर सबसे बूढी हथनी लक्ष्मी ने उसको हलके से दुलार लिया और फिर तो शौर्यादित्य का डर भी छूमंतर हो गया और वो लक्ष्मी को काफी देर तक सहलाता रहा। बड़ा ही प्यारा नज़ारा था। इसके बाद सभी प्रतिभागी हाथियों की पीठ पर बैठ कर जंगल की सैर को निकले।


बाघ (टाइगर) की झलक : हाथी की सफारी के बाद अब वक़्त था खुली जिप्सी से जंगल घूमने का। अभी मुश्किल से कुछ ही मिनट हुए होंगे जंगल में घुसे और रस्ते में चलते चलते अचानक मुझे ऐसा लगा की खाई में कुछ है। मैंने जिप्सी वाले भैया को बोलै की जिप्सी रोक कर थोड़ा पीछे लीजिये मुझे लगता है मैंने टाइगर देखा है !!! हमने जिप्सी पीछे ली और मैंने ध्यान से देखा तो करीब 100 फ़ीट निचे खाई में एक हष्ट-पुष्ट नर बाघ पेड़ की छाव में सोया हुआ था। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ अपनी आँखों पे, मैंने हमारे गाइड को दिखाया और उसने कहा "हो साहिब ये तो बाघ ही है"!!! अचानक से रोमांच की लहर सी दौड़ गयी और रोंगटे खड़े हो गए। 10 साल में पहली बार मैंने मेलघाट में बाघ देखा था। उसको देखने की उत्सुकता में सभी लोग पूछ रहे थे "कहाँ है-कहाँ है" और इसी शोर से बाघ की नींद खुल गई और जैसा की बोला जाता है मेलघाट के बाघ बहोत ही शर्मीले होते हैं, वो बाघ देखते ही देखते अचानक से घने वन में कही खो गया।




अजीबोगरीब जानवरों का मिलना : रात में घूमते हुए हमने एशियाई पाम सिवेट (मूषक बिलाव) को देखा !!! दलनायक ने हमे बताया की "पाम सिवेट" एक अहानिकारक और शर्मीली प्रजाति के रात्रिचर प्राणी हैं जो की फलों और छोटे कीटो पर ज़िंदा रहते हैं। सबसे अजीब बात तो ये थी की दुनिया की सबसे महंगी कॉफ़ी पाम सिवेट के मल से बनायीं जाती है और जो की विदेशों में बहोत प्रसिद्द है। हमारा तो कॉफ़ी से ही मन उठ गया। 




सर्प चील (serpent eagle) का दिखना : पहली बार हमने जाना की सरपेंट ईगल ऐसा पक्षी है जो सांपो को मार कर खाता है। 




प्रशिक्षण काम आया : जंगल सफारी शुरू होने से पहले ही पुरे दल को ज़रूरी अनुदेश और क्या करना क्या ना करना बता दिया गया था। रात्रि में खुली जिप्सी में घूमते वक़्त अचानक एक मादा भालू अपने शावक के साथ जिप्सी के सामने आ गई, जिप्सी में दल का नेतृत्व श्री के. पी. सिंह कर रहे थे और उनको सारे ज़रूरी अनुदेश याद थे| यहाँ यह बताना ज़रूरी है की भालू काफी खतरनाक होते हैं और मादा भालू जब अपने शावक के साथ होती है तो वो और भी ज़्यादा खतरनाक हो जाती है परन्तु के. पी. सिंह और सभी प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण के अनुसार ही व्यव्हार किया और मादा भालू अपने शावक के साथ सुरक्षित तरीके से अपनी राह पर निकल गई। जंगल में रात में घूमते हुए हमने कई सारे जानवर देखे |





इसी तरह दिन में सफारी करते वक़्त जिप्सी के सामने अचानक भारतीय गोर (Indian Gaur) जो की जंगली मवेशियों में एक सबसे बड़ी और भीमकाय प्रजाति है और जिसमे अकेले ही पूरी की पूरी जिप्सी कार को उलट देने की असीमित ताकत होती है वो सामने आ गया। सोचने समझने का कोई वक़्त नहीं था और भारतीय गौर हमारे सामने था परन्तु पूर्व में दिया गया प्रक्षिक्षण काम आया और सभी सकुशल वहां से निकल गए। इन सबमे ज़रूरी बात यह है की चूँकि आप जंगल में जंगली जानवरों के घर में आये हैं इसलिए आपको ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे उनको किसी भी तरह का मानसिक या शारीरिक तनाव हो। और सभी प्रतिभागियों ने ऐसा ही किया भी।




रोमांचक अनुभव : जंगल सफारी करते हुए हमे एक मचान पर ले जाया गया, हमे बताया गया की रोमांच के प्रेमियों के लिए मेलघाट में सारी रात घने जंगल में मचान पर बैठने का भी इंतेज़ाम है। यहाँ सारी रात मचान पर बैठ कर आप सभी तरह के जंगली जानवरों को चुपचाप देख सकते हैं जो सोच कर ही हम सभी रोमांचित हो गए। समय काम होने के कारन हम कुछ ही देर मचान का आनंद ले पाए पर अगली बार ज़रूर हम मचान पर बैठेंगे। 




बच्चों के लिए वरदान : आज के समय में जब बुरी आदतें और असभ्यता पूरी तरह से अपने पैर पसार चुकी है, ऐसे वक़्त श्री के पी सिंह और श्री सुधीर विजयन अपने बच्चों को लेकर उन्हें किसी होटल या सिनेमा हॉल या फिर किसी और विलासिता भरी जगह ले जाने की जगह धुल और गर्मी से भरे इस विशाल जंगल में जीवन के कुछ ज़रूरी पाठ पढ़ाने के लिए ले आये। हमारा जीवन जंगल से है और जंगल ही हमें जीने का सही तरीका सिखाते हैं। मोबाइल, इंटरनेट, मूवीज, व्हाट्सप्प और इसी तरह के भौतिक संसाधनों और बुरी आदतों से दूर ये पिता अपने बच्चों को बचपन से ही प्रकृति माँ की गोद में डाल कर उनका चरित्र निर्माण कर रहे हैं| ये जानते हैं की अगर बच्चों को बचपन से ही प्रकृति से जोड़ दिया जाये तो उनमे बुरी आदतें नहीं पड़ती है। धन्य हैं ऐसे जनक जिन्होंने शुरू से ही अपने बच्चों में पर्यावरण संरक्षण की भावना जगा दी है और यही पुत्र आगे जाकर अपने माता-पिता का विश्व पटल पर नाम रोशन करेंगे।





देश प्रेम भी : उपरोक्त संस्कारों का असर ही है की जब दल के सबसे छोटे प्रतिभागी मास्टर शौर्यादित्य से कैंपफायर के वक़्त गाना सुनाने को बोला तो उसने 3 देशभक्ति के गाने तो सुना दिए पर जब बोला की कोई फ़िल्मी गाना सुनाओ तो वह चुप हो गया और फिर उसके पापा के पी सिंह ने बताया की इसको देशभक्ति के अलावा कोई गाने आते ही नहीं है। शाबाश शौर्य, दिल से आशीर्वाद तुम्हे।


इस पूरी यात्रा का सुखद अंत एक जंगली नदी में सभी ने गर्मी को दूर करते हुए खूब मस्ती करके किया । और हाँ, हमने बचपन में मिलने वाली बर्फ की कुल्फी का भी लुत्फ़ लिया !!!






कुछ और तस्वीरें :












How to reach :
By Road : Melghat is easily connected by road, based on zone you can either go from Akot or from Dharni.
By Train : Nearest Railway station to Melghat is Akot & Amravati.
By Flight : It is advisable to board to flight to Indore and than take road journey.

Where to stay :
There are enough options available for stay but if you are looking for plenty of wildlife than "Shahnoor" is best. Tiger sighting is frequent and stay is also awesome.
If you are planning for capturing natural beauty & bird photography, than "Kolkaz" is best.

Best time to visit :
March to June : Summer is on its peak but best time to observe wild animals.
July to September : Rainy season, natural beauty at its peak, best for observing natural beauty, waterfalls, trekking but not good for wildlife observation.
October to February : Winter season, best time for birding & landscape photography, you can observe wildlife in early morning time.

What to do :
Day Jungle Safari, Night Safari, Machaan (Tree House) Stay, Elephant Safari, Trekking, Waterfall Hiking, Kayaking & Relaxing.

Whom to Contact :
For more details, bookings & group tour plans you can contact at 8989463577 or write us at islpindore@gmail.com

Tuesday, 22 January 2019

कीर्तेश्वर महादेव गुफा का रहस्य 


माफ़ी चाहता हूँ दोस्तों, पूरा एक साल हो गया और मैंने आप लोगो को कोई नयी जगह नहीं बताई। खैर देर आये दुरुस्त आये, इस बार फिरसे में आपको एक बहोत ही खूबसूरत, प्राचीन और रहस्यों से भरपूर एक खोयी हुयी दुनिया में ले चलता हूँ जहा जाकर आप निश्चित ही प्रकृति माँ के अनुपम सौंदर्य और प्राचीन धरोहर को देखकर अभिभूत हो जायेंगे। 

दोस्तों कुछ साल पहले वनों में स्वच्छंद विचरण करते हुए मुझे कुछ आदिवासी मिले, गर्मी बहोत ज़्यादा होने से और उनमे से एक को असहज महसूस होते देख मैंने उनको अपने पास से इलेक्ट्रोल का घोल पिलाया। इलेक्ट्रोल पी कर कुछ अच्छा महसूस करके हमारी बातें आगे बढ़ी। मेरे बारे में जानकार उन्होंने मुझे एक जगह जाने का सुझाव दिया जो की अति प्राचीन रहस्यमयी और घने जंगलों के बिच बसी है। 

अपनी बात को जारी रखते हुए उसने बताया, की पास के रामकुल्ला गाँव के सुदूर घने जंगल में एक अति प्राचीन गुफा है, दन्त कथा के अनुसार प्राचीन काल में अर्जुन की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान् शिव कीर्तेश्वर का रूप धारण करके पश्चिम सिक्किम में प्रगट हुए थे (वर्तमान में जहा कीर्तेश्वर मंदिर है) उसी वक़्त भगवन शिव की परछाई यहाँ पड़ी थी एवं विशाल पर्वत का सीना चिर कर शिवलिंग प्रगट हुए थे, इसीलिए इस जगह को कीर्तेश्वर महादेव गुफा  का नाम दिया गया। लोग ये भी कहते हैं की प्राचीन समय में यहाँ उस शिव लिंग की पहरेदार के लिए एक बहोत ही भयंकर शेषनाग रहता था जिसके चलने के निशानों पर आज गुफा के सामने नदी बहती है। 

उस आदिवासी के द्वारा दी गई जानकारी मेरे अंदर के खोजी को जगाने के लिए काफी थी, समय की कमी के चलते मैं बाद में आकर उस जगह को देखने का वादा कर अपने गंतव्य की ओर चल दिया। 

समय बीतता गया और अपने आलसी स्वाभाव की वजह से मैं अगले १ महीने तक उस जगह नहीं जा पाया, फिर अचानक एक दिन मैंने उस जगह पर जाने का मन बना कर साथ में इलेक्ट्रोल के बहोत सारे पैकेट रखकर उस ओर निकल गया। समीप के गाँव रावत पलासिया पर पहुंच कर मैंने सारे पैकेट गाँव के सरपंच को दे दिए जो की भीषण गर्मी में लू लगने पर ग्रामवासियों के काम आते। 

इसके पश्चात मैं शिव के प्राकृतिक वास की और चल दिया। घने जंगलों में से होते हुए वनमार्ग पर मैं यही सोचता सोचता बढ़ता जा रहा था की ना जाने कितना खूबसूरत और सौंदर्य से परिपूर्ण वो नज़ारा होगा जहाँ बीते समय की कहानी बयाँ करता है एक पर्वत और उसके अंदर गहरी गुफा होगी। मैं यही सब सोचते सोचते आगे चलता जा रहा था और अचानक खामोश जंगल में एकदम से जान आ गई और सूखे पत्तों पर सैकड़ो कदमताल की आवाज़ से पुरे माहौल मैं सनसनी फ़ैल गयी। ध्यान से देखने पर ज्ञात हुआ की कुछ दुरी पर हिरणों का झुण्ड विचरण कर रहा था जो की मेरे आने से घबरा कर दौड़ पड़ा। इसे देखकर मुझे उस आदिवासी की याद आयी जिसने कहा था जंगल में जंगली जानवर बहुतायत में हैं अतः ध्यान से जाएँ। 

खैर जान में जान आयी और मैं आगे की तरफ बढ़ा। कुछ २-३ किलोमीटर चलने के बाद मैं उस भव्य और अलौकिक संसार में प्रवेश कर गया। निश्चित ही उस जगह पर आज भी किसी दैवीय शक्ति का वास था। एक तरफ जहा मैं घने जंगलों को पार करके आया था, दूसरी तरफ जंगलो के बीचो-बिच एक भव्य पहाड़ और उसके सामने सांप के आकर में बहती चौड़ी नदी का पाट और बहुत से फूटबाल के मैदानों के आकर के बराबर फैला हुआ खुला मैदान और इन सबके बिच पहाड़ को चीरती हुई कीर्तेश्वर महादेव की गहरी गुफा बहुत सारे रहस्यों का आगाज़ कर रही थी। 

चारो और प्राचीन शैलखंडो और शैल चित्रों की आकृतियां विद्यमान थी, नदी के किनारे चलते चलते मैं उस प्राचीन पर्वत के समीप आ गया, जहाँ लगभग ५० फ़ीट की ऊंचाई पर वह गुफा स्थित थी। स्थानीय लोगों ने ऊपर चढ़ने के लिए सीढिया बनायीं हुए थी जिसके सहारे मैं उस गुफा के मुहाने तक पहुंच गया। 

देखने में अति प्राचीन, गहरी और अन्धकार से भरी हुयी यह गुफा निश्चित ही मानव निर्मित नहीं थी और इतना साहस किसमे जो पहाड़ को खोदकर इतनी गहरी गुफा बना दे ??? गुफा का दरवाज़ा करीब ६ फ़ीट और उसका रास्ता करीब ३ फ़ीट ऊँचा ही था, किसी अप्रत्रिम घटना और अज्ञात शक्तियों के डर से मैं अंदर प्रवेश करने से झिझक रहा था और क्यों ना हो? आखिर ऐसी जगह कई सारे खतरनाक कीटों और रेंगने वाले जीवों का घर जो बन जाती है। 

खैर नियति पे विश्वास करके और अपने मोबाइल का टोर्च जला कर मैं अंदर घुसा, मार्ग संकरा और छोटा होने के कारन मैं घुटनों के बल रेंग कर चल रहा था, कुछ दूर अंदर जाने के बाद मुझे घने अँधेरे ने घेर लिया, पीछे देखने पर गुफा के द्वार से एक प्रकाश पुंज सा आ रहा था जिससे मेरी हिम्मत बंधी और में आगे बढ़ता गया। आगे बढ़ते हुए अचानक मुझपर आसमानी हमला हुआ, कर्कश चीत्कार करते हुए बहुत सरे चमगादड़ मेरे सर के ऊपर से उड़ने लगे जो की इसी गुफा के रहवासी थे। चूँकि जगह बहुत काम थी, इसलिए में पूरी तरह से जमीन पर लेट गया और उन चमगादड़ों का वहां से चले जाने का इंतज़ार करने लगा। जब सभी चमगादड़ उड़ गए या किसी सुरक्षित स्थान पर चले गए तब में फिरसे उठा और घुटनो के बल आगे बढ़ा। गुफा के द्वार से करीब ३०-४० फ़ीट अंदर आ जाने के बाद मैं ऐसे स्थान पे पंहुचा जहा में सीधा खड़ा हो सकता था, चारो तरह गुफा की कंदराएँ, जर जर हो चुकी चट्टानें और ऊपर की तरफ असंख्य चमगादड़ मुझे घूर-घूर के देखते हुए मुझे डरा कर वापस बाहर जाने के लिए विवश कर रहे थे परन्तु शिव को पाने की चाह और निर्भय होकर अपनी खोज पूरी करने की लालसा मुझे वहां रोके रही। 

और तभी मेरी नज़र मेरे बाई और पड़ी जहाँ एक छोटे से कक्ष में साक्षात् शिव लिंग अपनी प्रकृति में विराजमान थे। मन किया की पूछ लूँ "हे भोले इतने बड़े बड़े मंदिरों को छोड़ कर तुम क्यों इन गुफाओं में निवास करते हो?" दिल से जवाब आया की शिव तो कण-कण में विराजमान है पर उसके स्थापना का स्थान तो उस ढोंग-दिखावे और लोभ-लालच की दुनिया से परे शांत, शीतल, प्राकृतिक और समान अधिकार से जीने वाले वन्य जीवों के बिच इस निश्छल वन में ही होना चाहिए। बस फिर शिव लिंग के दर्शन किये और अपने एवं अपने परिवार के कल्याण की कामना कर मैं वहां से निकल गया। गुफा के द्वार से जब चारो और देखा तो मुझे इस जगह की भव्यता का अंदाज़ा हुआ। उसकी प्राकृतिक खूबसूरती ने मेरा मन मोह लिया। 

इस बात को काफी समय बीत जाने पर और लोगों को इस जगह के बारे में पता चल जाने पर वर्ष 2018 में मैंने यहाँ अपने समूह के साथ ट्रैकिंग की और सभी को इसकी खूबसूरती दिखाई। उसी समय की कुछ फोटोज में आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ। शायद आपको पसंद आये। जो लोग इस जगह को देखना चाहते हैं वो हमारे ग्रुप "https://www.facebook.com/insearchoflostpugmarks/" के पेज को लिखे करें, फरवरी माह में एक ट्रेक हम इस जगह की भी करेंगे। 






Thursday, 8 March 2018

Celebration of Holi in the Color of Wilderness

Hi Friends, This month during holidays for Holi festival, I decided to reanimate my photography skills after a long gap of 3 years. The question was what to photograph? One thing was go outside and photograph colorful people on streets trying to make each other look a like aliens. But this was not my cup of tea!!!

I am a nature lover thus I should capture the colors of the nature... and the best way to do this was "Bird Photography".

The next thing came in my mind was "Where to go???" As it was starting of summer season and migratory birds tend to leave for the next destination however I knew few places where still I could find some beautiful birds near water bodies.

Tip: Before proceeding for Bird photography, make sure you are wearing camouflage cloths, good camera with telephoto lens, light snacks for munching, drinking water & lots of patience. Also make sure the area in which you are going is well familiar to you or bring some local boys with you for safety.

So what I am waiting for??? Lets go...

I left little late as the best time for birding is either early morning or evening. During the day time temperature keeps hot and it will make you uncomfortable and you will not be able to fully concentrate on photography which is again a hectic job as the birds are very sensitive and you can't go near to them easily. Most birders either do camouflage and wait until bird comes near or they wear total camouflage and crawl slowly near to bird. There is one more option, if you are a billionaire,  purchase 1200-1700mm Bazookas... :D :P

So finally I reached at destination around 4pm. The waterbody where I was going for birding was around 3Km far from the place where I parked my vehicle. I had to cross a thick and beautiful forest by trekking <3.


As I started walking in the forest, I was immediately stunned by the beauty of the colors of wilderness. It was making like the whole forest is welcoming me and showing me that I made a wise decision by leaving behind artificial colors and celebrating bright colors of wilderness.



Truly amazing!!!


As I was making my way, the whole forest was throwing more and more colors on me.


Birds were chirping like they are also singing holi songs...




As I went little closer to the destination, A Woolly-Necked Stork came for the Sky Survilance


Little more ahead, Red-naped Ibis who was painted by Red color on head by the nature immediately informed others about my presence.
  

Now I was on the verge of the water body & a Pied Kingfisher who recently had a bath in the water took my attention.


Just near to it, pair of Ruddy shelduck was celebrating Holi in the Water. They were also colored by the nature.


Meanwhile my friend was also enjoying the colors of nature.


As I turned, I saw a pair of Painted Stork observing our activity. After a day long Holi celebration, they were taking rest at a tree bark.


The Pied Kingfisher was still waiting for his friends to come and drench him in colors..


I was looking at it and suddenly a Woolly-necked Stork rap out at me as the life giving Sun was also throwing its bright colors on us...


Wow!!! How priceless moment it was... The whole universe was celebrating festival of colors...


As the day was ending, my friend was giving a thought:-


If the whole universe is filled by the colors, why we are wasting our life in celebrating artificial things. Why we are not putting our lives to protect and preserve this beautiful colorful world and their beautiful creatures.

Give a thought and decide by yourself because "A mistake repeated more than once is a decision!!!"

A birding trip which became a story by Ambuj Jain









Thursday, 30 November 2017

My Spiritual Exploration of an Ancient Hidden Cave

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी जगह ले चल रहा हूँ जो की अपने आप में अद्भुत और प्राचीन है। यह जगह ना जाने कितने लाखो वर्षो से इसी तरह नीरव, खामोश और न जाने कितने ही रहस्यों को अपने अंदर समेटे हुए है। मैं बात कर रहा हूँ एक रहस्यमयी गुफा की जो इंदौर से लगभग ४५ किलोमीटर दूर घने वन में प्रकृति की गोद में समायी हुई है।

वैसे तो मैं एकांत और खूबसूरत स्थानों की खोज में सुदूर एवं घने वनों में एकांकी यात्रा करता रहता हूँ और कई बार कुछ ऐसे दुर्लभ दृश्यों का साक्षी बनता हूँ जो की शब्दों में बयां नहीं किये जा सकते और ना ही आम आदमी का उससे कोई सरोकार होता है। ये मेरा स्वाभाव है की में एकांकी घूमते हुए आदिवासी लोगो से मिलता हुआ उस क्षेत्र की जानकारी लेता रहता हूँ। बात अगर वनों की हो तो आदिवासियों से ज़्यादा ज्ञान किसी को नहीं होता और मैं इसका भरपूर लाभ उठाता हूँ। इसी सिलसिले में कुछ दिन पहले मैं रात्रि के समय इंदौर से ४५ किमी दूर एक स्थान पर गया था, वहां पर मेरी मुलाक़ात कुछ आदिवासी भाइयों से हुई जिन्होंने मुझे जंगल के अंदर एक अतिप्राचीन गुफा के बारे में बताया जो की एक पहाड़ की तली में निचे खाई में बानी हुए थी और जहा पर शिव का वास था। उनके वर्णन के अनुसार वह जगह मेरे लिए बहोत रोमांचकारी थी परन्तु रात्रि का समय होने से और मेरे पास टॉर्च इत्यादि साधन न होने से और जंगल में बड़े जंगली जानवरों की उपस्थिति ज्ञात होने से मैं उस रात वहां नहीं गया।

जिज्ञासा की भावना हावी होने से और एक अज्ञात स्थान को जानने की उत्सुकता के चलते में उस रात सो नहीं पाया और अगले दिन मैं सुबह से ही उस स्थान की खोज में निकल पड़ा। निकटतम आदिवासी ग्राम में पहुँचने पर मैंने वहां के स्थानीय लोगो से उस जगह का रास्ता पूछा और निकल पड़ा अपनी खोज को पूरा करने।

घने वन और कच्ची पगडण्डी पर में आगे बढ़ता गया, पहाड़ी के मुहाने पर पहुँच कर निचे खाई को एक संकरा रास्ता जा रहा था, वही मेरा मार्ग था। रास्ता बेहद उबड़-खाबड़ और संकरा था। भुरभरे पत्थर जूतों को पकड़ बनाने नहीं दे रहे थे। ज़रा सा पैर फिसला और आप सीधे खाई में। कई जगह मुझे सुरक्षित आगे बढ़ने के लिए चौपाया भी बनना पड़ा। पतझड़ का मौसम है इसलिए जंगल हर जगह से पिले रंग का दिख रहा था परन्तु आगे की जगह पूरी हरियाली से भरी हुए प्रतीत हो रही थी मानो किसी रेगिस्तान में एक नख्लिस्तान बना हो।

एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ खाई और बिच में एक संकरा रास्ता और उस रास्ते पर चलते हुए धीरे धीरे मैं एक अलौकिक संसार में प्रवेश कर गया। चरों और हरियाली, खुशबू से सराबोर माहौल, लाल नीले पिले रंग के खूबसूरत फूल और पहाड़ के ऊपर से बहता एक छोटा सा झरना और झरने के पीछे एक अतिप्राचीन गुफा का दर्शन मुझे निश्चित ही किसी पारलौकिक स्वप्न लोक में ले आया था। ऐसा अद्भुत नज़ारा जो सिर्फ पंचमढ़ी या ऐसे ही किसी दूसरे स्थलों पर देखने को मिलता है उसे यहाँ देखकर मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।

प्रकृति सबसे सूंदर कृतियां बनाती है यह मैंने पहले भी देखा और उस दिन भी। अचंभित करने वाली संरचना, तरह तरह की वनस्पति एवं जड़ीबूटियां, ऊँचे ऊँचे वृक्ष, लम्बी लम्बी लताएं मेरा मन मोह रही थी। गुफा मार्ग पर निरंतर पानी की धरा बह रही थी जो निश्चित ही वन्य जीवों की कंठ तृप्ति का साधन होगी| गुफा के अंदर प्रवेश करते हुए में समझ नहीं पा रहा था की भय और जिज्ञासा में से कौन ज़्यादा मुझपर हावी है। ऐसी गुफाओं में सर्प, बिच्छू, चमगादड़, मधुमखियां और कई प्रकार के जीवों का वास होता है अतः मैं सावधानी पूर्वक आगे बढ़ा| गुफा में घुप अँधेरा था इसलिए मैंने अपने मोबाइल की टॉर्च जला ली|

जैसे ही आगे बढ़ा, कर्कश स्वर करते हुए मेरे सर के ऊपर से चमगादड़ उड़ने लगे जो शायद उस गुफा के ही निवासी थे| खुद को सँभालते हुए में आगे बढ़ा और बायीं तरफ देखा तो एक झरोखे से कोई अज्ञात प्रजाति का जीव मुझे घर रहा था, मैंने उसपर टॉर्च से रौशनी डाली तो वो मेरे मन का भ्रम निकला। फिर में आगे की ओर बढ़ा तो एक अलौकिक दृश्य मेरे सामने आया, गुफा के अंतिम छोर पर एक स्वयंभू शिवलिंग बना हुआ था और उसपर प्राकृतिक रूप से जल धरा का सतत अभिषेक हो रहा था। मैं धन्य हो गया जो शिव ने मुझे अपने दर्शन दे दिए थे। उस अलौकिक स्थान पर कुछ समय बिताने और कुछ छायाचित्र लेने के उपरान्त मैं अपने वापस अपनी दुनिया की ओर आ गया।

इस पूरी यात्रा की कुछ तस्वीरें हैं जो की मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ :-












कोरोना से लड़ने में सहायक प्राकृतिक ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर - Fight with Corona with the help of Natural Oxygen Concentrator at you home

  दोस्तों कोरोना की इस वैश्विक महामारी के समय आज हम सभी ऑक्सीजन का महत्त्व जान रहे हैं। हर तरफ त्राहिमाम मचा हुआ है। कई लोग ऑक्सीजन की कमी क...